आज मेरे पास एक अद्वितीय पुस्तक आई है—*समयक हस्ताक्षरः शेफालिका वर्मा* (मैथिली संस्करण), जिसे संकलित किया है श्रीमती कुमकुम झा एवं श्री राजीव कुमार वर्मा ने। यह पुस्तक प्रकाशित हुई है 1 जनवरी 2021 को (Paperback)।
सोमवार, 8 सितंबर 2025
समयक हस्ताक्षरः शेफालिका वर्मा
मनसरबी – मैथिली उपन्यास
**मनसरबी – मैथिली उपन्यास**
गुरुवार, 7 अगस्त 2025
संस्मरण ओ समीक्षा - मोनक चान सुरुज
डॉ. शेफालिका वर्मा, इ नाम साधारण नाम नहि थिक। मिथिलावासीक मध्य नञि जानि कतेकोकेँ दीदी, चाची, काकी, आ मातृस्वरूपा छथि। हिनका लोक मैथिलीक 'महादेवी वर्मा' कहि गौरवान्वित होइत अछि। हिनका हृदयमे स्नेहक समुद्र अछि जाहिमे जे चाहै जेना चाहै डुबकी लगाबय की ओहिठाम बैस मनोवृत्तिक अनुकूल स्नेहाशीष प्राप्त करै।
हम प्रयास मात्र क' रहल छी जे अपन उद्गार, अनुभव कोना व्यक्त कएने छथि एहि पोथी 'मोनक चान सुरुज'क संस्मरणात्मक कथामे।
हमर अनुभव की ज्ञान एतेक की अंशो मात्र
नहि जे समभाव राखि सकब। समयक अभाव तँ स्वाभाविके भ' गेल अछि। पोथीक उपलब्धता अमेज़ॉन
पर रहबाक कारणें ऑनलाइन खरीद मंगबेलहुँ, जे जखन दिल्ली जाएब तँ समय निकालि पढ़ब। से
जे से पोथी दिल्ली निवास स्थान पहुंच गेल। समय बीतल आ सोह धरि नञि रहल जे कोनो पोथियो
पठउने छी सबटा बिसरा गेल छल। नोकरी-चाकरीक मध्य कतेको बातक सोह खासक' निजी जिनकीक हमरा
जनैत कतेको लोककेँ नहि रहैत हेतन्हि, सैह हमरो भेल।
दिल्ली पहुँचलाक बाद अचानक एक
दिन (बेबी) कनियाँ कहैत छथि जे हे लिअ अपन समान जे आहाँ ऑनलाइन अपना लेल पठौने छी।
ओहीमे सँ निकलल 'मोनक चान सुरुज' आ देखितहिं मोनमे भेल जे कखन पढ़ब ! जकर मुख्य कारण
छल आदरणीया मातृस्वरूपा डॉ. शेफालिका वर्मा जिनकर नित्यहिं आशीर्वाद हमरा व्हाट्सएपक
माध्यमसँ भेटैत रहैत अछि।
खैर जे से तखनो समयक अभावे छल। तंजानिया
सँ किछु दिनक लेल जखन छुट्टी पर भारत जाइत छी तँ कने आर वयस्तता बढ़ले रहैत अछि। इ काज,
ओ काज, नाना प्रकारक काज, भेंट - घांट इत्यादि। मुदा चोट्टहिं पोथीकेँ लैपटॉप बैगमे
राखि लेलहुँ जाहिसँ बिसरि नञि कम सँ कम संग चलिजाए। आ से नीके कएल, पोथी छुटबाक कोनो
चारा नञि रहि गेल। 3 दिसंबर 2023 क' हमर जेठ बालक चिरंजीवी दर्शकेँ जन्मदिन मना राति
10:30 बजे करीब घर सँ बिदा भेलहुँ पुनः रोजी रोटी लेल तंजानिया आ ससमय पहुँचलहुँ दिल्लीक
इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा ।सब सुरक्षा जाँच इत्यादिक बाद नियत जगह जा
बैसलहुँ। समयोपरांत जहाजमे बैसलहुँ, जहाज उड़ल, वातावरण सामान्य भेल। तखन निकाललहुँ
-- 'मोनक चान सुरुज'
स्वभाविक रूपें पोथीक भूमिका पढ़ल आ तखन
देखैत छी जे पोथीक भूमिका सेहओ हमर सबहक प्रिय आदरणीय डॉ. कैलाश कुमार मिश्र निवासी
अड़ेर, मधुबनीक हमर गामक पड़ोसी थिकाह। भूमिकामे डॉ. कैलाश जी स्वयं स्पष्ट करैत छथि
जे हमरा सनक सामान्य लोक लेल हिनकर रचना पर किछु लिखब केर अर्थ भेल अनन्त प्रकाश सँ
भरल सुरुजकेँ दीप देखाएब। तहन हमरा सनक अधना कोन दीप जरायत ? ओ फेर लिखैत छथि जे इ
पोथी 'मोनक चान सुरुज' लेखिकाकेँ केर आत्मकथा अथवा जीवनक संस्मरणक तीन कड़ीक अंतिम कड़ी
छन्हि। पूर्वक दू गोट प्रकाशित आत्मकथाक नाम 'किस्त-किस्त जीवन' आ 'आखर -आखर प्रीत'
छन्हि। एकर अतिरिक्त ओना तँ आर पोथी सब प्रकाशित छन्हि।
हिनका द्वारा लिखल भूमिका सँ
पाठककेँ लेखिकाक विषयमे बुझब ओ गुणब सहजें भ' जेतन्हि आ आगाँक कथा रुचिसँ पढताह/ पढतीह।
लेखिका सेहओ अपन दुई शब्दक अंतर्गत लिखैत छथि-- हमर मोनक यात्रा कोना क्षणहिमे कोसो
कोस घुमि अबैत अछि------ई सब निरूपित अछि एहि पोथीमे। तैं एकर नाम राखल अछि ' मोनक
चान सुरुज'। कहैत छथि-------मनुखक भाग्य जकाँ
पोथीक सेहओ भाग्य होइत छैक। पोथी जहन हाथ लेब, पढ़' लेल बैसब तँ इ हमर विश्वास थिक जे
अवश्य बिना पूरा पढ़ने नञि छोड़ब। हम एकटा पाठकक रूपें एहि शब्दकेँ पूर्णतः समर्थन करैत
छी। हमरा संग ठीके एहन भेल जखन पढ़बाक क्रममे एलहुँ तँ क्रमशः पोथी पढ़ि सम्पूर्ण कएल
ताहिमे कतौ कोनो संदेह नञि।
ओना तँ फेर कहैत छी जे डॉ. कैलाश जीक भूमिका
ततेक ने साधल ढंग सँ लिखल गेल अछि हमरा किछु लिखबा लेल भेटिए नञि रहल अछि।
लेखिकाक अपनहि जीवन संगी ललन वर्मा जी
लिखैत छथि -- एक दिस प्रेम, करुणा दया आ सहजहिं पसिझय बाली शेफालिका आ दोसर दिस क्रांतिकारी
शेफालिका दुनू व्यक्तित्वक रस्सा - कस्सीमे बढ़ैत सहित्यधर्मी शेफालिका स्वतः एक अद्भुत
व्यक्तित्वक स्वामिनी बनि गेल छथि जे बुझबामे कखनहुँ हम सेहो अपनाकेँ अक्षम पबैत छी।
साहित्य सृजन लेल हुनका प्रयास नञि करए पड़ैत छन्हि साहित्य ओहिना हुनका सँ बहराइत छन्हि
जेना शिवजीक जटा जूटसँ गंगा स्वतः बहरा क' अबाध गति सँ कल्याण लेल प्रबाहमान थीकिह।
एहने थीकिह डॉ. शेफालिका अपन पतिक दृष्टिमे।
एहि पोथीक दोसर भूमिकाक मध्य चंद्रेश
जी लिखैत छथि--- हिनका साहित्यक प्रति अगाध आस्था आ रचनामे अभिव्यक्ति करबाक समर्पण
भाव अछि। अथाह वेदना,पीड़ा,करुणा आदिक संग हिनक रचनामे सामाजिक कुव्यवस्थाक प्रति जे
विद्रोहक स्वर अछि आओर ओ जे खुजिक' सत्यानुभूतिमे बात विचार प्रकट कएलन्हि अछि सैह
हिनका मीरा बनबैत छन्हि। चंद्रेश जी पुनः कहैत छथि---- ओ स्वयं हँसैत छथि आ जन - जनकेँ
हसब' चाहैत छथि आ खिल - खिलाइत समाजकेँ देख' चाहैत छथि। स्त्री विरोधी मानसिकताक वैश्विक
रोगकेँ हटबैत, जन-जनमे प्रेम- भाव भरैत, नवचेतनाक अभ्युदयमे जनसरोकारक प्रति प्रतिबद्धता
रखैत ओ स्वस्थ समाजक निर्माण हेतु भूमिका एहि पोथीक मादे निमाहलानि अछि से अनुपम धरोहर
थिक।
एहि पोथीक पहिल पड़ाव अछि 'मिथिला धाम
सँ कश्मीर धरि' सच कही तँ एहि कथाकेँ पढ़ब हम तखन प्रारम्भ केने छलहुँ जखन दिल्ली सँ
तंजानिया क मध्य हवाई जहाजमे छलहुँ। आ से एकरतियो इ नञि अनुभव भेल जे धरती छोड़ि आकाश
मार्ग सँ कतौ जा रहल छी। एकदम जेना हम कखनो मिथिला आ श्रीनगर तँ कौखन कश्मीर। कौखन
होटलमे तँ कौखन बाग बगीचा इत्यादिमे हमहुँ फोटो खिचेबाक एकटा हिस्सा छी। एना लगैत छल
जेना हमहुँ हुनका संग थाकि हुनके लग बैस गेल छी। एखन धरि हमरा जम्मू-कश्मीर दिस जएबाक
अवसर नञि भेल अछि मुदा एना लगैत अछि जेना बिन गेनहि घुमि एलौं। एहि कथानान्तर्गत बेसी
की कहु - एतबे कहब बिन गए गेने कश्मीर घुमबाक हो तँ इ पोथीक संस्मरण पढ़ी।
एहि क्रममे दोसर पड़ाव थिक ' पुरान टिहरिक
दर्द देखल - भोगल' एहि कथाक मध्य हम एतबे अनुभव कएल जे शारीरिक रूपें लेखिका तँ टिहरीक
भ्रमण क' रहल छथि मुदा हुनका कोसीक देखल भोगल दर्द बेर-बेर टिभकी उठैत छन्हि।
मुख्यतया पंद्रहटा कथाक एहि पोथीक मध्य अछि।
एक - एकटा संस्मरण पढ़बा काल ध्यान किन्नहुँ नञि एमहर - ओमहर हएत से हमरा विश्वास अछि।
प्रत्येक कथा अनेक रस सँ पाटल अछि, कौखन हँसब, कौखन कानब, आ की कौखन विस्मृत भ' जाएब
से कहब कठिन अछि। एहि पोथीकेँ पढ़लाक बाद स्वयं
पाठककेँ बुझबामे आबि जएतन्हि जे की कारण थिक जे डॉ. शेफालिका वर्माकेँ मैथिलीक महादेवी
वर्मा आ हिनक पाठक हिनका मातृतुल्य आदर करैत छन्हि। हिनका लेल एतबे कहब जे ----
संजय झा 'नागदह'
प्रकाशित : मिथिलांगन, ओक्टुबर 2023 - मार्च 2024
रविवार, 3 अगस्त 2025
उड़ैत वंशी -पाठकीय :संजय झा 'नागदह'
सिराउर (मैथिली उपन्यास) - पाठकीय : संजय झा 'नागदह'
'सिराउर' एकटा मैथिली उपन्यास जकर लेखक थिकाह श्री दिलीप कुमार झा जे वस्तुतः उच्छाल (वनमाली टोल) गामक सम्प्रति मधुबनीमे रहि अध्यापन करैत भाषा साहित्यक सेवामे कतेको बरख सं अनवरत लागल छथि। हमरा हिनक पोथी पढ़बाक लालसा एहि कारने भेल जे हिनकर कविता संग्रह 'बनिजाराक देसमे' ताहि लेल यात्री सम्मान, उपन्यास 'दू धाप आगॉ' ताहि लेल डॉ गणपति मिश्र सम्मान प्रदान कएल गेल छन्हि। एहन सम्मानित व्यक्तिक उपन्यास सामने पड़ल तं खरीद क' पढ़ल। अपनाकें एकरा पढ़वा सं वंचित केना रखितहुं। अनेक तरहक बातकें बहुत सुंदर ढंग सं परसल गेल अछि जाहि सं दूर भेल मैथिल जन यदि एहि उपन्यासकें पढ़ता तं बड् बात सबकें पुनरास्मरण भ' जेतन्हि। ब्राम्हण सं इतर वियाहक विधि विधान सेहो सब सं पाठक परिचित हेताह। एहि उपन्यासक मध्य प्रेम लीलाक मिठास अति लघु अछि जकरा कने आर नमारला सं पाठककें आर बेसी मनोरंजन होएतन्हि। ओना इ उपन्यासकें इति करबाक लेल प्रेम प्रसंग एकटा सार्थक प्रयास रहल अछि। दिलीप जीकें हृदय सं शुभकामना। तेसर.. चारिम लिखथि आ हम सब पढ़ि। नीक पोथी अछि पाठककें पढ़क चाहियन्हि।
महामहोपाध्याय गंगानाथ झाक “कवि रहस्य’क मैथिली अनुवाद : अश्विनी कुमार तिवारी
एकटा साधारण व्यक्ति द्वारा एकटा असाधारण कृति पर एकटा सार्थक प्रयास कयल गेल। ई काज अचानके सामान्य साधारण व्यक्ति के आगाँ असाधारण व्यक्तित्व मे बदलि देबाक सामर्थ्य रखैत अछि। जाहि व्यक्ति के चर्चा अतय क रहल छी से छैथि हमर सहपाठी श्री संजय झा। संगी छथि, सहपाठी छथि, सेहो हाफ पैंटक जमाना कें तैं कने आवश्यक झुकाव परिलक्षित भ सकैत अछि। महामहोपाधयाय सर गंगानाथ झा लिखित कवि रहस्यक, मैथिली अनुवाद हमर सिनेही संजय झा नागदह जीक
हम जखन कखनो अपन कोनो प्रोजेक्टपर जाएत छी त’ यात्रामे कुनो ने कुनो पोथी पढ़ैत छी । दू दिन पहिले चतुर्थ आयाम उपन्यास इ नमोनाथ जी लिखितक हिंदी अनुवाद आदरणीय सियाराम झा सरस जीक द्वारा पठाओल गेल छल, पढलहुँ, नीक उपन्यास धरतीसँ ब्रह्मांड धरिक कथामे संयोजन , विज्ञान , अंतरिक्षक रुचिगर , बान्हल उपन्यास । पाठककेर इतिसँ अंत धरि बन्हबामे पूर्ण रुपेण सुफल । एकटा उद्योगपतिक व्यापारिक यात्रा , परिवारिक संबंध , पति पत्नीक पारस्परिक विश्वास , अन्ततोगत्वा संन्यासी बनब , यथार्थक चित्रण करबामे लेखक सुफल रहलाह । मुख्य पात्र दारुका जी जे थ्री डी नामसँ प्रसिद्ध, हुनक अपन अर्द्धांगिनीक लेल सभ किछु समर्पित, जकरा प्रेमसँ किछु आओर कहि परिभाषित करब अतिशयोक्ति नहि, एहेन प्रेम कमे देखल जाएत छैक, ओ अपन पत्नीक सहपाठीकेर अपन व्यापारिक साम्राज्यमे दोसर स्थान देलाह, हुनक अपन मिथिलानी पत्नी अनुपमा साहू, जकरा ओ अनु कहि सम्बोधित करैत छथि, अनुकेँ लेल ओ सभकिछु त्यागै लेल तैयार , हुनक ख़ुशीमे दारुकाजीक खुशी, सायते संभव भ’ सकैत अछि , मुदा की ओ पत्नी हुनको लेल ओतबे समर्पित छली एहि उपन्यासक’ जखन पढब तखन पता लागत । की नायिका अनु अपन सहपाठी दीपक ढोलकिया जी लेल किछु मोनमे रखैत छथि ?ढोलकिया जी अपन सचिव रेखा भटनागर जी लेल हिया हारल, की रेखाक मोनमे हुनक स्थान छैक आकि बस व्यक्तिगत किछो नहि ….
शनिवार, 2 अगस्त 2025
पोथी : बजितथि जँ उर्मिला ( मैथिली दीर्घ कविता) -पाठकीय
समयक हस्ताक्षरः शेफालिका वर्मा
आज मेरे पास एक अद्वितीय पुस्तक आई है—*समयक हस्ताक्षरः शेफालिका वर्मा* (मैथिली संस्करण), जिसे संकलित किया है श्रीमती कुमकुम झा एवं श्री राज...
आहाँ सभक बेसी पसन्द कएल - आलेख /कविता /कहानी
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आज मेरे पास एक अद्वितीय पुस्तक आई है—*समयक हस्ताक्षरः शेफालिका वर्मा* (मैथिली संस्करण), जिसे संकलित किया है श्रीमती कुमकुम झा एवं श्री राज...
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