बुझि अप्पन आ हम्मर आन
छोड़ि रहल छल ढ़ाकीक - ढ़ाकी
झुठक सरबत बाँटि रहल छल
लाखों लोक लग पाँति - पाँति।
संजय झा "नागदह"
दिनांक :01/12/2015
आज मेरे पास एक अद्वितीय पुस्तक आई है—*समयक हस्ताक्षरः शेफालिका वर्मा* (मैथिली संस्करण), जिसे संकलित किया है श्रीमती कुमकुम झा एवं श्री राज...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें